विदिशा– आमतौर पर हमारे समाज में माता-पिता की मृत्यु होने पर बेटे को ही अंतिम संस्कार और मुखाग्नि देने का हकदार माना जाता है। समाज में बदलती सोच और बेटियों के बढ़ते सम्मान की एक मार्मिक मिसाल उस समय देखनेत्य को मिली, जब जैन समाज की लगभग 70 वर्षीय महिला के निधन के बाद उनकी पुत्री ने परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए अपनी मां को मुखाग्नि दी। इस भावुक क्षण ने न केवल परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र को भाव-विभोर कर दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जैन समाज की श्रीमती सरोज जैन 70 वर्षीय महिला का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। परिवार में कोई पुत्र नहीं होने के कारण उनकी पुत्री ने आगे बढ़कर सभी अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई। जब शव को अंतिम यात्रा के लिए ले जाया गया, तो माहौल गमगीन था और हर आंख नम थी। शनिवार को शहर के बेतवा नदी के पास स्थित श्मशान घाट पर पहुंचकर बेटी ने पूरी श्रद्धा और साहस के साथ अपनी मां को मुखाग्नि दी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें भर आईं। समाज में अक्सर बेटों द्वारा किए जाने वाले इस कर्तव्य को बेटी ने निभाकर यह संदेश दिया कि अब बेटियां भी हर जिम्मेदारी उठाने में सक्षम हैं। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और समाज के बुद्धिजीवियों ने बेटी के इस साहसिक कदम की सराहना की। कई लोगों ने इसे समाज में सकारात्मक बदलाव का संकेत बताया।
समाज के लोगों का कहना है कि यह घटना उन रूढ़ियों को तोड़ती है, जो वर्षों से चली आ रही थीं, और यह साबित करती है कि बेटी और बेटा दोनों समान हैं। अंत में, मां-बेटी के इस रिश्ते ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि सच्चा प्यार और कर्तव्य किसी परंपरा का मोहताज नहीं होता। बेटी द्वारा दी गई यह अंतिम विदाई पूरे क्षेत्र के लिए एक भावुक और प्रेरणादायक उदाहरण बन गई।